भारत ने अफगानिस्तान को दिए 22 हजार करोड़ रुपए, तालिबान के आने से क्या डूब जायेगे भारत के पैसे।

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पिछले कुछ दिनों से हम सब देख रहे है कि, किस तरह से अफगानिस्तान में चारो तरफ अफरातफरी मची हुई है। क्यों की अफगानिस्तान पर एक बार फिर तालिबानियों ने कब्जा कर लिया है। फिर से वहां के लोगो पर कहर बरपाना शुरू कर दिया है। और यही कारण है की वहां के लोग अपना देश, अपना सब कुछ छोड़ वहा से भाग जाना चाहते है। हम लगातार न्यूज़ चैनल और टीवी के माध्यम से देख रहे है, किस तरह लोग वहा से निकलने की कोशिश कर रहे है। क्यों की वहा की हालत नाजुक होते देख पिछले दिनों अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भी अपना सारा सामान और पैसे से भरे हेलीकॉप्टर लेके उड़ गए। अपने देशवासियों को बुरे हालात में छोड़ के, वही काबुल एयरपोर्ट से दिल दहला देने वाली भी हमने कई तस्वीर देखी। जब लोग प्लेन के पहिए और फैन के जगह बैठ कर देश से निकलना चाहे लेकिन प्लेन के टेक ऑफ करते ही वो हवे में गिरते नजर आए। कई दर्दनाक और भयावक तस्वीर निकल कर सामने आ रही। लेकिन आज हम बात करेगे अफगानिस्तान और भारत के रिश्ते के बारे में जिस देश में भारत ने अपने कई करोड़ रूपए लगाए हो। क्या वहा पर अब तालिबानियों के कब्जा हो जाने के बाद भारत पर भी कुछ असर देखने को मिलेगा।

भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते।

भारत और अफगानिस्तान दोनो पड़ोस में बसे दक्षिण एशियाई देश है। और भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते हमेशा से बहुत अच्छे रहे है क्यूंकि भारत हमेशा से अफगानिस्तान की हर संभव मदद करते आया है। और भारत के रिश्ते अफगानिस्तान से महाभारत के काल से है, क्यूंकि गंधार जोकि आज कंधार है वहा की रानी का विवाह हस्तिनापुर जोकि आज दिल्ली है के राजा हुई थी। 2011 में मनमोहन सिंह की सरकार ने वहा के मौजूदा राष्ट्रपति हामिद करजई के भारत दौरे के दौरान तेल और गैस के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसी प्रकार से भारत और अफगानिस्तान ने कई विकासीय समझौते किए थे। और हमेशा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दोनो देश एक दूसरे का समर्थन भी करते है। अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। तकरीबन 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश भारत का अफगानिस्तान में है।
नवंबर 2020 जेनेवा आयोजित अफगानिस्तान कांफ्रेंस में विदेश मंत्री जय शंकर ने बताया था कि, अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांत में भारत 400 से ज्यादा परियोजनाओं पर काम कर रहा है। यही नहीं भारत पिछले साल 8, करोड़ डॉलर के 100 कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम की भी शुरुवात की थी।

भारत का दिया हुआ सलमा डैम।

अफगान इंडिया फ्रेंडशिप डैम के नाम से जाने जाने वाला सलमा डैम जिसे भारत ने बना के अफगानिस्तान को दिया है। हेरात प्रांत में बना है ये डैम जिसे खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 4 जून 2016 में उद्घाटन किया गया था। इसे हरी नदी पर बनाया गया है जिसकी लागत लगभग 2 हजार करोड़ रूपए है। हेरात के चेशते शरीफ जिले में सलमा बांध अफगानिस्तान के सबसे बड़े बांधों में से एक है। इस डैम से इलाके के हजारों परिवारों को सिंचाई का पानी और बिजली मिलती है। सलमा बांध की जल भंडारण क्षमता 640 मिलियन क्यूबिक मीटर है। सलमा डैम हालिया सालों में अफगानिस्तान में भारत की सबसे महंगी परियोजनाओं में से रही है। 4 अगस्त को तालिबान आतंकियों ने सलमा डैम पर हमला किया था जिसे अफगान सैनिकों ने विफल कर दिया था। अफगानिस्तान रक्षा मंत्रालय ने इस हमले को लेकर बताया था कि इस कारवाई में कई आतंकी हताहत हुए और तालिबान का बहुत नुकसान हुआ। जुलाई महीने में भी तालिबानियों ने सलमा डैम को उड़ाने की कोशिश की थी। तालिबान ने डैम पर रॉकेट से निशाना बनाया था लेकिन रॉकेट डैम के नज़दीक गिरे थे और डैम को कोई नुकसान नहीं हुआ था।

Salma Dam

भारत ने बनाया जारांज- डेलाराम हाइवे।

भारत के बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने अफगानिस्तान में 218 किलोमीटर लंबा हाईवे बनाया है। ईरान सीमा के पास मौजूद जारांज-डेलारम हाईवे के निर्माण पर 15 करोड़ डॉलर खर्च हुए हैं। यह हाईवे इसलिए भी अहम है क्योंकि यह अफगानिस्तान में भारत को ईरान के लिए एक वैकल्पिक मार्ग देता है। जारांज हाईवे के निर्माण में भारत के 11 लोगों और 129 अफगानियो को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। जारांज-डेलारम के अलावा भी कई रोड प्रोजेक्ट में भारत ने निवेश किया हुआ है। जारांज-डेलाराम प्रोजेक्ट भारत के सबसे महत्वपूर्ण निवेश में से एक है। पाकिस्तान अगर जमीन के रास्ते भारत को व्यापार करने से रोकने के प्रयास करता है तो उस स्थिति में यह सड़क बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। और इसके अलावा भारत ने कई छोटी छोटी अन्य सड़को का भी निर्माण अफगानिस्तान में किया है।

Zaranj Delaram Highway

काबुल स्थित संसद भवन तक का निर्माण भारत ने किया।

जिस अफगान संसद के अंदर जाहिल अफगानी बंदूक ताने बैठे है, उसका निर्माण भी भारत द्वारा कराया गया है। अफगानिस्तानी संसद का निर्माण भारत-अफगानिस्तान के मित्रता और सहयोग के प्रतीत के तौर पर किया गया। इसका निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) ने कराया। इसके निर्माण में 600 करोड़ रुपये की लागत आई। अफगानिस्तान में लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद दार-उल-अलम को तालिबानी आतंकियों ने बम धमाके से उड़ा दिया था। जिसके बाद उसकी हालत कुछ ऐसी हो गई थी। जिसके बाद सीपीडब्ल्यूडी को इसके निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस बम धमाके ने अफगानिस्तान की संसद को जमीन पर ला दिया, जिसके बाद संसद की नई इमारत के निर्माण की जरूरत महसूस हुई तो अफगानिस्तान सरकार ने साल 2004 के मार्च महीने में एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को संसद ने सर्व सम्मति से पास कर दिया जिसके बाद अगस्त 2005 में इसकी पहली नींव रखी गई। उस वक्त के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी इबारत रखी थी। भारत ने अफगानिस्तानी संसद के निर्माण का बेड़ा उठाया जिसके बाद अक्टूबर 2005 में इसके निर्माण स्थल का चुनाव किया गया। इस दिशा में तेजी से कई प्रक्रिया की गई लेकिन अगस्त 2006 में अफगानिस्तान सरकार को कुछ नई जरूरतें महसूस हुई जिसके बाद फिर से इसका एक नया प्लान बनाया गया। इसके अगले साल जुलाई 2007 को संसद के निर्माण का टेंडर जारी किया गया लेकिन जिन 10 कंपनियों ने टेंडर भरे थे वह अपना प्लान अगस्त तक सामने नहीं रख पाए। इसके बाद 2008 में अफगान कैबिनेट ने इमारत के निर्माण की समय सीमा तय कर दी जो नवंबर 2011 थी। लेकिन इसके निर्माण में हुई देरी की वजह से इसकी समय सीमा बढ़ाकर दिसंबर 2013 कर दिया गया। इस इमारत के निर्माण में उपयोग में लाए जाने वाले समंगम पत्थर (स्थानीय स्तर पर पाया जाने वाला पीला संगमरमर) आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाने की वजह से दिसंबर 2012 में इसमें सफेद संगमरमर लगाने का फैसला किया गया। इस फैसले की वजह से निर्माण का कार्यकाल और बढ़ गया जिसे मार्च 2014 कर दिया गया। आखिरकार 2015 25 दिसंबर को प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नए संसद भवन का उद्घाटन किया और अफगान जनता को समर्पित किया।

Parliament Building

यही नहीं भारतीय कंपनियों ने बिजली आपूर्ति और टेलीकॉम कंपनियों ने भी इस देश के लिए कई काम किए। और हेल्थ सेक्टर में भी भारत का अहम योगदान रहा है भारत ने अफगानिस्तान में कई हॉस्पिटल बनाए है। वहा भारत और अफगानिस्तान में 2019- 2020 में व्यापार करीब 1.3 अरब डॉलर तक पहुंचा।

400 से अधिक प्रोजेक्ट पर भारत कर रहा काम।

भारत ने अफगानिस्तान में रोड, डैम, बिजली ट्रांसमिशन लाइन और सब स्टेशन, स्कूल-अस्पताल आदि बनाए हैं। भारत ने अफगानिस्तान में तीन अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया हुआ है। भारत की तरफ से अफगानिस्तान के इंफ्रा प्रोजेक्ट्स में बड़े निवेश पर अब तालिबानी शासन की वजह से खतरा पैदा हो सकता है। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक अफगानिस्तान में भारत ने 400 से अधिक छोटे-बड़े प्रोजेक्ट पर काम किया है।

आयत निर्यात पर पड़ा असर।

अफगानिस्तान से भारत में आने वाला ड्राई फ्रूट्स जिस पर तालिबान ने प्रतिबंध लगा दिया है। और जिसकी वजह से इसके दामों में तेजी आने की संभावना है, क्यूंकि इसका 85 फीसदी आयत अफगानिस्तान से ही किया जाता था। तालिबानियों ने अफगानिस्तान पर कब्जा बनाते ही और अपना नियंत्रण बनाएं रखने के लिए भारत में आने वाले ड्राई फ्रूट्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब न तो काबुल से कुछ निर्यात किया जा सकता है न ही आयत। एफआईईओ डीजी ने कहा, भारत फिलहाल अफगानिस्तान को चीनी, दवाइयां, कपड़े, चाय, कॉफी, मसाले और ट्रांसमिशन टावर की सप्लाई करता है, जबकि वहां से आने वाला अधिकतर आयात ड्राईफ्रूट्स का ही है। हम थोड़ा प्याज और गोंद भी वहां से आयात करते हैं।

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