अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़ भागे, तालिबानियों ने काबुल पर किया कब्जा।

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अफगानिस्तान में स्थिति इस समय भयावक बनी हुई है, और चारो तरफ डर और खौफ का मंजर है। स्थिति हाथ से निकलते देख वहां के राष्ट्रपति अशरफ गनी रविवार को देश छोड़ दिया। और देशवासी और विदेशी सभी लोग युद्धग्रस्त देश से निकलने के लिए प्रयासरत है। वही अल -जजीरा चैनल के माध्यम से प्रसारित वीडियो फुटेज में साफ देखा जा सकता है की तालिबान लड़ाको का एक बड़ा समूह काबुल स्थिति राष्ट्रपति भवन के अंदर कब्जा बना लिया है। और वही आज की जो तस्वीर काबुल से आ रही वो और भी भयानक और दिल दहला देने वाली है, काबुल एयरपोर्ट पर लोगो की भारी भीड़ लगी है। हर कोई देश से बाहर जाना चाहता है। वहां के लोग अपना सारा सामान छोड़ के बस वहा से भाग जाना चाहते है। लोगो की भीड़ इतनी ज्यादा है की लोग प्लेन में चढ़ने के लिए एक दूसरे को धक्का दे रहे। जो अंदर नही जा सकते वो प्लेन के बाहर बैठे है। वही अमेरिकियों का एक प्लेन अपने अफसरों को निकलने के लिए रनवे पर है लोग उसके आगे पीछे दौड़ रहे है। कुछ लोग प्लेन के टायर और पंखे पर बैठे हुए थे जो प्लेन टेक ऑफ के बाद कुछ लोग ऊपर से गिरते भी नजर आए।

1979 युद्ध।

साल 1978 से अफगानिस्‍तान में युद्ध का वो नया दौर शुरू हुआ जो आज तक जारी है। सउर क्रांति जिसमें तख्‍तापलट हुआ था, उससे इस देश में नए तरह के संघर्ष की शुरुआत हुई थी। इसके बाद से एक के बाद एक कई संघर्ष देश में हुए। साल 1979 में सोवियत-अफगान युद्ध शुरू हुआ और 10 साल के बाद 1989 में जाकर खत्‍म हो सका। उस समय सोवियत संघ ने देश में सत्‍ताधारी पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्‍तान (PDPA) को समर्थन दिया जो देश में सरकार के खिलाफ माहौल को तैयार कर रही थी। सोवियत संघ की सेना ने अफगान आर्मी के साथ मिलकर विरोध में मदद की उस समय जो लड़ाई हुई उसे अफगान मुजाहिद्दीनों के खिलाफ लड़ा गया युद्ध माना गया। इस युद्ध में रूस को जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक का भी समर्थन मिला था। अफगान मुजाहिद्दीन को अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, पाकिस्‍तान, सऊदी अरब, इजिप्‍ट और चीन के साथ ही जर्मनी का समर्थन मिल रहा था। रूस को आखिर में हार माननी पड़ी थी और तब जाकर युद्ध खत्‍म हुआ था। इसी समय 1979 के आस पास अफगान के पड़ोसी देश ईरान में भी एक क्रांति हुई जिसे कहा जाता है ईरानियन रोवोल्यूशन 1979 दरसल ईरान और अफगानिस्तान की स्थिति सामान्य थी क्यों की एक तरफ इस्लामिस्ट थे और दूसरी तरफ लेफ्टिस्ट और कम्युनिस्ट थे। ईरान के राजा मोहम्मद रेजा जोकि मॉर्डलिज्म और सेकुलिरिसम में विश्वास रखते थे। इन्होंने अपने देश से इकोनॉमिकल डेवलपमेंट भी ले थे। लेकिन इन्हें सत्ता का लालच था और इसी कारण इन्होंने अपने विपक्षीयो की हत्या करवा दी। और फिर इनके खिलाफ एक क्रांति हुई और इस्लामिक ने ईरान को अपने कब्जे में ले लिया। वही पड़ोसी देश ईरान में ये सब देख अफगानिस्तान के हफीजउल्लाह अमीन जो की एक कम्युनिस्ट थे उन्हें डर लगा की कही इस्लामिस्ट हमे भी अपने कब्जे में ना लेले। और इसी वजह से वो धार्मिक भावनाओं में विश्वास रखने लगे अपने भाषणों में अल्लाह का नाम लेने लगे और मस्जिदों का भी निर्माण कराया, और कुरान के कॉपी को लोगो तक पहुंचाया। लेकिन जनता इन्हे भी पसंद नही करती थी। लेकिन सोवियत ने हफीजउल्लाह अमीन को मरवा दिया था उसका कारण ये था कि अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट विचारधारा बदनाम हो रही थी। इसके बाद बाबराक करमल को गवर्नमेंट में बैठा दिया गया और फिर ये पावर में आते थी पुराने झंडे को बदल कर एक नया झंडा दिया। और वादा किया को अफगानिस्तान को एक नया संविधान दिया जायेगा। और इसके अलावा फ्रीडम ऑफ स्पीच, प्रोटेस्ट ऑफ फ्रीडम का भी वादा किया और फिर लोगो को लगने लगा था की अब अफगानिस्तान में शांति आएगी।

कौन है तालिबान।

पस्तुन भाषा में तालिबान का मतलब है ‘स्टूडेंट’ शुरुवात में इस तालिबान के लीडर थे मुल्लाह उमर जिसने 50 स्टूडेंट के साथ ये ग्रुप बनाया। लेकिन टाइम के साथ पाकिस्तान से कुछ रिफ्यूजी वापस आए थे पाकिस्तान में और ये लोग भी हिस्सा बन गए तालिबान ग्रुप के और देखते ही देखते इनकी संख्या 15000 हो गई। तालिबान को पाकिस्तान और सऊदी अरेबिया भी स्पोर्ट किया और ये भी कहा जाता है की तालिबान को बनाने में कही ना कही अमेरिका कभी हाथ है। क्यूंकि अमेरिका मुजाहिद्दीन को हथियार सप्लाई करता था और उनका साथ देता था और इसी वजह से कही ना कही इन सब की शुरुवात हुई। और फिर सितंबर 1996 तक तालिबान काबुल पर कब्जा कर लेता है। और फिर तालिबान अफगानिस्तान में कई चीजे बैन कर देता है जैसे सिनेमा, टीवी, म्यूजिक, वीसीआर, फुटबाल, चेस, पेनिटिंग्स, फोटोग्राफी, दाढ़ी कटना, विदेशियों पर प्रतिबंध, इंटरनेट, एनजीओ, यूएन के दफतर, और 10 साल के ऊपर के लड़कियों को शिक्षा तक का हक तालिबान छीन लेता है। मर्दों को दाढ़ी रखना और औरतों को बुर्के में और घर से बाहर निकलने के भी अनुमति नहीं थी। और ये वहां के राष्ट्रपति को भी मार देते है और हिंदुओं को एक अलग से बैच दिया जाता था जैसे पता चल सके की ये मुस्लिमो से अलग है। और फिर ये सब होता देख पूरी दुनिया में तालिबानियों को लेके लोग इनके खिलाफ हो गए। लेकिन तीन देश थे जो तालिबान के साथ थे। पाकिस्तान, सऊदी अरेबिया, और यूएई।

ऐसा कहा जाता है कि इन्‍हीं आतंकियों ने 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए हमले में शामिल आतंकियों की मदद की थी। इन आतंकियों ने सुबूत के बिना अपने सरगना ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से इनकार कर दिया था। अक्‍टूबर 2001 में अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्‍तान में दाखिल हुई थीं। यूएस मिलिट्री यहां पर 9/11 का बदला लेने के लिए आई थी। अमेरिकी सेनाओं के आते ही तालिबान का किला ढह गया मगर अब 2 दो दशक बाद तालिबान फिर से अफगानिस्‍तान पर काबिज हो गया है।

और भी इसी कारण के वजह से अमेरिका भी अपने देश में हुए हमले का बदला लेना चाहता है तो उसने अपने आर्मी को अफगानिस्तान भेजता है और एयरस्ट्राइक भी कराता है जहा उसे लगता है की यहां आतंकी छिपे हो सकते है। और ऐसा नहीं है की इस एयरस्ट्राइल में सिर्फ आतंकी मारे जायेंगे जाहिर है कुछ आम लोग भी इसका शिकार होगे। लेकिन अमेरिका नॉर्थन मुजाहिद्दीन एलाइन का स्पोर्ट लेकर दिसंबर 2001 में तालिबान को पूरी तरह से पीछे कर देता यूएसए। और फिर 2004 में एक नया संविधान बनाया जाता है अफगानिस्तान में और इलेक्शन कराया जाता है और 6 मिलियन से ज्यादा लोग वोट करते है। और फिर वहा के नए राष्ट्रपति बनते है हामिद कारजई। और फिर इस पूरे मामले पर अमेरिका अपनी आर्मी अफगानिस्तान में भेजी रहती है वहा पर शांति बनाए रखने के लिए। और 2020 में यूएस प्रेसिडेंट बने ट्रंप ने तालिबान के साथ शांति के साथ बात करतें है। ये बात करते है की अगर तालिबान अपने रिश्ते आतंकी संगठन से हटा लेगा तो अमेरिका अपने फोर्सेज वापस बुला लेगी। और फिर अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन भी ट्रंप के फैसले को मानते हुए निर्णय लेते है की अमेरिका अपने आर्मी को अफगानिस्तान से वापस बुला लेगी। और यही कारण है की अमेरिका अपनी आर्मी को वापस बुलाते है। और फिर तालिबानों ने अफगानिस्तान पर फिर से कब्जा कर लिया। आज अफगानिस्तान के 90% बॉर्डर तालिबान के कब्जे में है।

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