ब्राह्मण वोट क्यों है जरुरी, आखिर सबकी नजर ब्राह्मण वोट पर क्यों सपा और बसपा करेगी ब्राह्मण सम्मेलन।

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यूपी में 2022 आगामी विधानसभा चुनाव होने है और ऐसे में राजनीतिक गलियारों में उथल पटक मची हुई है, ऐसे में ब्राह्मण वोट को लेके पार्टियों में होड़ मची हुई है सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन करने की बात कही तो अब सपा ने भी तैयारिया शुरू कर दी है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी है, हर कोई अपने वोट बैंक के लिए हर वो मुमकिन कोशिश कर रही जिससे वोटरों को अपने तरफ रिझाया जा सके। ऐसे में बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी ब्राह्मण कार्ड खेला है उन्होंने यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुवात कर भी दी है बसपा के राष्ट्रीय महासचिव और मायावती के सबसे करीबी माने जाने वाले सतीश चन्द्र मिश्रा ने 23 जुलाई को अयोध्या में रामलला के दर्शन और हनुमान गढ़ी में पूजा पाठ की और इस सम्मेलन को पांच चरण में बांटा है, सभी का आगाज उत्तर प्रदेश के अलग अलग धार्मिक नगरी से किया जाएगा। सतीश चन्द्र मिश्रा ने कहा कि यदि प्रदेश के 13 फीसदी  ब्राह्मण और 23 फीसदी दलित मिलकर भाईचारा कायम कर लें तो राज्य में बसपा की सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता है।

इन सबको देखते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी पार्टी के अपने पांच बड़े ब्राह्मण नेताओं से मुलाकात की और ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुवात करने की बात कही समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण नेताओं ने अखिलेश यादव को भगवान परशुराम की प्रतिमा भेट करके यूपी के बलिया जिले से शुरू करने की बात कही है।

ब्राह्मणों को रिझाने के लिए भगवान परशुराम की मूर्ति को लेकर अटकलें।

ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करने के लिए पिछले साल से ही पार्टियों में होड़ मची हुई है सपा ने कहा था अगर हम सत्ता में आते है तो लखनऊ में भगवान परशुराम की मूर्ति स्थापित करेगे। और वही दूसरी तरफ मायावती ने भी बहती गंगा में हाथ धोना चाहा, मायावती ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा की अगर सपा को मूर्ति लगवानी ही थी तो वो अपने सरकार में क्यों नहीं लगवाया अब क्यों याद आ रही। सपा ने लखनऊ में 108 फीट की परशुराम की प्रतिमा लगाने का वादा किया तो जवाब में मायावती ने कहा कि जब प्रदेश में बीएसपी की सरकार आएगी तो ब्राह्मणों के देवता परशुराम की सबसे बड़ी मूर्ति बनवाएंगी। यही नहीं पार्क और अस्पताल के नाम भी परशुराम के नाम पर करने का ऐलान कर दिया।

क्यों जरूरी ब्राह्मण वोट।

यूपी में आप ब्राम्हण वोट को इग्नोर नहीं कर सकते ये अकेले दम पर सरकार तो नहीं बनवा सकते, लेकिन इन्हें दरकिनार कर के भी आप सरकार नहीं बना सकते। सभी दलों के लिए ये सत्ता की चाबी से कम नहीं है यूपी के जातीय समीकरण में करीब 12 फीसदी ब्राह्मण हैं। करीब 1 दर्जन जिलों में इनकी आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है. वाराणसी, चंदौली, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, अमेठी, बलरामपुर, कानपुर, प्रयागराज में ब्राह्मण मतदाता 15 फीसदी से ज्यादा है। यहां किसी भी उम्मीदवार की हार या जीत में ब्राह्मण वोटर्स का रोल अहम होता है।

2007 की तर्ज पर चुनाव लड़ेंगी मायावती।

2007 में एक नारा बहुत प्रचलित हुआ था “ब्राह्मण संख बजाएगा, हाथी बढ़ता जायेगा” एक बार फिर मायावती उसी फार्मूले के साथ सत्ता में आने का प्रयास कर रही है 14 साल पहले यही नारे ने मायावती को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया था। और अब 2022 के आगामी चुनाव में भी एक बार फिर ब्राह्मण वोट को साधने की पुर जोर कोशिश की जा रही है।
2007 में ब्राह्मणों को लाने के लिए मायावती ने उस वक्त ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ और ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा हाथी बढ़ता जाएगा’ जैसे नारे गढ़े थे, ये नारा और फॉर्मूला कामयाब भी रहा, (BMOD) ब्राह्मण, मुसलमान ओबीसी और दलित का गठजोड़ बनाकर मायावती ने 206 सीटों के साथ सरकार बनाई थी। सीटों के लिहाज से ये बीएसपी का एक रिकॉर्ड था।

बीजेपी से नाराज ब्राह्मणों का क्या फायदा उठा पाएगी सपा और बसपा।

बीजेपी को तो लगता है कि ब्राह्मण सिर्फ उनके है एक जमाने में बीजेपी को ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कहा जाता था, 2017 में 56 ब्राह्मण विधायक चुने गए थे, इनमें से 46 तो बीजेपी के थे। एक दौर था जब ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित को कांग्रेस का वोट बैंक कहा जाता था, लेकिन इस बार ऐसा भी सुनने में आ रहा की सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ से ब्राह्मण नाराज है और इसी का फायदा उठाने के लिए विपक्ष ने बीजेपी के खिलाफ माहौल बना रही। बीजेपी सरकार में ब्राह्मण को हत्या और SC-ST मुकदमे और अफसरों के तबादले नियुक्ति, ट्रांसफर और पोस्टिंग पर ब्राह्मणों से भेदभाव का आरोप लगा।

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