हिजाब

शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने के कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को अपना अंतिम निर्णय देगा । जस्टिस हेमंत गुप्ता और सुधांशु धूलिया की खंडपीठ इस मामले में 13 अक्टूबर को अपना फैसला सुनाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले, हिजाब मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था ।

इस मामले में 21 वकीलों के बीच दस दिनों तक बहस चली थी । याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ड्रेस कोड वाले कर्नाटक सरकार के संदर्भ में पीएफआइ से उसके ताल्लुक का कोई जिक्र नहीं था । सर्वोच्च अदालत में दायर विभिन्न याचिकाओं में से एक में बताया गया है कि सरकार और प्रशासन छात्राओं को अपने धर्मों का पालन करने देने में भेदभाव बरतते है । इससे कानून व्यवस्था बिगड़ने की परिस्थितियां पैदा होती है । एक अन्य याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट ने अपने आदेश में छात्र-छात्राओं को समानता के आधार पर क समान निर्धारित वेशभूषा पहननी चाहिए ।

हिजाब

 

सुप्रीम कोर्ट में जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई थी, तब सबसे पहले कर्नाटक सरकार के उस सर्कुलर पर बहस छिड़ी जिसमें हिजाब पर बैन लगाने की बात हुई थी । अब याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में जोर देकर कहा कि राज्य सरकार ने क्या सोचकर आजादी के 75 साल बाद यूं हिजाब पर प्रतिबंध लगाने की सोची ? ऐसे में किस आधार पर राज्य सरकार वो सर्कुलर लेकर आई थी, ये स्पष्ट नहीं हो पाया । दुनिया के दूसरे देशों के कुछ उदाहरण देकर भी हिजाब पहनने को सही ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट के सामने अमेरिकी सेना के कुछ नियम बताए गए थे तो पश्चिम के दूसरे देशों में दिए गए अधिकारों का भी जिक्र हुआ था । कोर्ट को बताया गया कि अमेरिका में सेना में भर्ती लोगों को पगड़ी पहनने की इजाजत रहती है ।

कर्नाटक में हिजाब विवाद जनवरी के शुरुआत में उडुपी के ही एक सरकारी कालेज से शुरू हुआ था, जहां मुस्लिम लड़कियों को हिजाब पहनकर आने से रोका गया था । स्कूल प्रबंधन ने इसे ड्रेस कोड के खिलाफ बताया था । इसके बाद अन्य शहरों में भी यह विवाद फैल गया । मुस्लिम लड़कियां इसका विरोध कर रही हैं, जिसके खिलाफ हिंदू संगठनों से जुड़े युवकों ने भी भगवा शॉल पहनकर जवाबी विरोध शुरू कर दिया था । एक कॉलेज में यह विरोध हिंसक झड़प में बदल गया था, जहां पुलिस को स्थिति नियंत्रण करने के लिए आंसू गैस छोड़नी पड़ी थी ।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने क्या दिया था फैसला?

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 14 मार्च को हिजाब विवाद पर फैसला सुनाया था, जिसमें कहा था कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है । हाईकोर्ट ने आगे कहा था कि छात्र स्कूल या कॉलेज की निर्धारिक ड्रेस कोड पहनने से इनकार नहीं कर सकते ।

इस्लाम में हिजाब का अभिप्राय परदे से है । जानकारों की मानें तो कुरान में हिजाब कपड़े के तौर पर नहीं बल्कि परदे के तौर पर बताया गया है । औरत और मर्द दोनो को ढीले और शालीन कपड़े पहनने के लिए कहा गया है । अक्सर हिजाब और नकाब को एक ही समझा जाता है । पर नकाब चेहरे को ढांकने का कपड़ा होता है । हालाकि इस्लाम में चेहरे को ढांकने की बात नही की गई है । इसमें सर और बाल छुपाने का ज़िक्र आता है । कट्टरपंथी देशों में अक्सर महिलाओं को नकाब डालने के लिए कहा जाता है ।

भारत जैसे देशों में अक्सर मुस्लिम महिलाओं को बुर्के में देखा जा सकता है । बुर्का नकाब का ही एक अलग प्रारूप है। बुर्के में आंखे भी ढंकी होती हैं। आम तौर पर इसका रंग काला होता है । आपको बता दे कि एक बुर्के की बनावट लबादे की तरह होती है । इसे एक ही रंग का रखा जाता है जिससे उस महिला से कोई गैर आकर्षित न हो पाए ।

क्या है हिजाब विवाद ?

कर्नाटक में हिजाब विवाद उस समय शुरू हुआ था, जब उडुपी के एक सरकारी स्कूल में कुछ छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में जाने पर रोक लगा दी गई थी। इसे लेकर देश के कई हिस्सों में काफी प्रदर्शन हुए थे । इसी दौरान आठ फरवरी को मांड्या में पीईएस कॉलेज के अंदर भगवा शॉल पहने लड़कों ने जयश्री राम के नारे लगाए ।

जिसके बाद विवाद और बढ़ गया । जय श्री राम के नारे लगाती भीड़ के सामने 19 साल की मुस्कान खान ने अल्लाह हू अकबर के नारे लगाए थे । इसके बाद मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि हिजाब इस्लाम धर्म का अभिन्न अंग नहीं है, इसलिए राज्य सरकार को इसे स्कूलों के अंदर यूनिफॉर्म का हिस्सा बनाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता ।

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