कांग्रेस गहलोत और पायलट

राजस्थान में जारी संकट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और स्पीकर सी.पी. जोशी की 92 विधायकों के इस्तीफे पर चुप्पी से सवाल उठने लगे हैं कि क्या प्रदेश राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है ? हालांकि सभी की निगाहें राजभवन पर है । भाजपा ने वेट एंड वॉच की रणनीति अपनाई है ।

भाजपा के नेता स्पीकर सी.पी. जोशी के अगले कदम का इंतजार कर रहे है, जिसके बाद वो राजभवन का दरवाजा खटखटा सकते है । बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया एक कार्यक्रम में शामिल होने दिल्ली रवाना हो गए है । हालांकि, संभावना है कि राजस्थान की राजनीति पर वरिष्ठ नेताओं से चर्चा हो सकती है । इसी बीच विधानसभा में विपक्ष के उपनेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा है कि जब सरकार के 90 फीसदी विधायक और मंत्री पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं तो मुख्यमंत्री को आपात बैठक बुलाकर विधानसभा भंग करने की घोषणा करनी चाहिए ।

कब लगता है राष्ट्रपति शासन ?

राष्ट्रपति शासन भारतीय संविधान की धारा 360 और 356 के अंतर्गत किसी भी राज्य और देश में सभी लगाया जाता है जब देश की कानून व्यवस्था या ऐसी कोई आर्थिक संकट आ जाए तब उस स्थिति में देश का राष्ट्रपति राज्य और देश में राष्ट्रपति शासन लगा सकता है I इसके अलावा अगर देश में किसी भी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है या राज्य में भी ऐसी स्थिति है तब देश और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है I क्योंकि उसके पास यह संविधान के दिए हुए अधिकार हैं, लेकिन उसे इस प्रकार की चीजों को करने के लिए राज्यपाल और प्रधानमंत्री के तरफ से अनुरोध मिलना आवश्यक अपने अधिकार का पालन कर पाएगा ।

बता दें कि राष्ट्रपति शासन उस स्थिति में भी लागू होता है, जब राज्य विधानसभा में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं हो । सत्तारूढ़ पार्टी या केंद्रीय (संघीय) सरकार की सलाह पर, राज्यपाल अपने विवेक पर सदन को भंग कर सकते हैं, यदि सदन में किसी पार्टी या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत ना हो । राज्यपाल सदन को छह महीने की अवधि के लिए ” निलंबित अवस्था ” में रख सकते है । छह महीने के बाद, यदि फिर कोई स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना हो तो उस दशा में पुन: चुनाव आयोजित किये जाते है ।

राजस्थान

इस शासन को राष्ट्रपति शासन क्यों कहा जाता है ?

इसे राष्ट्रपति शासन इस बीच लिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण बजामय एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के, सीधे भारत के राष्ट्रपति  के अधीन आ जाता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किये जाते है । प्रशासन में मदद करने के लिए राज्यपाल आम तौर पर सलाहकारों की नियुक्ति करता है, जो आम तौर पर सेवानिवृत्त सिविल सेवक होते है । आमतौर पर इस स्थिति मे राज्य में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों का अनुसरण होता है ।

इस शासन में अनुच्छेद 356 के तहत, केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो ।यह अनुच्छेद एक साधन है, जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति (जैसे कि दंगे जिनसे निपटने में राज्य सरकार विफल रही हो) की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है (ताकि वो नागरिक अशांति के कारणों का निवारण कर सके) ।

राष्ट्रपति शासन कब लागू होता है ?

राष्ट्रपति शासन उस स्थिति में भी लागू होता है, जब राज्य विधानसभा में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं हो । सत्तारूढ़ पार्टी या केंद्रीय (संघीय) सरकार की सलाह पर, राज्यपाल अपने विवेक पर सदन को भंग कर सकते है । यदि सदन में किसी पार्टी या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत ना हो । राज्यपाल सदन को छह महीने की अवधि के लिए ” निलंबित अवस्था ” में रख सकते है । छह महीने के बाद, यदि फिर कोई स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना हो तो उस दशा में पुन: चुनाव आयोजित किये जाते है ।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और स्पीकर सी.पी. जोशी की 92 विधायकों के दिए इस्तीफे

राजस्थान में जारी संकट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और स्पीकर सी.पी. जोशी ने कथित तौर पर विधायकों द्वारा दिए गए लगभग 92 इस्तीफे पर, राज्य में अटकलें लगाई जा रही थीं कि क्या यह राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है । अब सभी की निगाहें राजभवन पर हैं क्योंकि भाजपा राजस्थान में राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में प्रतीक्षा और घड़ी का दृष्टिकोण अपनाती है ।  पायलट गतिरोध खत्म होने से इनकार भाजपा पार्टी के नेता स्पीकर सी.पी. जोशी की अगली चाल, जिसके बाद वह राजभवन का दरवाजा खटखटा सकते है । बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया एक कार्यक्रम में शामिल होने दिल्ली रवाना हो गए है ।

हालांकि, संभावना है कि राजस्थान की राजनीति पर वरिष्ठ नेताओं से चर्चा हो सकती है । इसी बीच विधानसभा में विपक्ष के उपनेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा है कि जब सरकार के 90 फीसदी विधायक और मंत्री पहले ही इस्तीफा दे चुके हैंं, तो मुख्यमंत्री को आपात बैठक बुलाकर विधानसभा भंग करने की घोषणा करनी चाहिए‌ । उन्होंने आगे कहा कि विपक्षी बीजेपी पूरे हालात पर नज़र रखे हुए है‌ ।

सोमवार को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विपक्ष के उपनेता दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि स्पीकर को पार्टी विधायकों द्वारा दिए गए इस्तीफे स्वीकार करने चाहिए । बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कहा, ” कांग्रेस विधायकों ने स्वेच्छा से और होशपूर्वक इस्तीफा दिया तो विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी को इसे स्वीकार करना चाहिए था, कांग्रेस में कलह का खामियाजा प्रदेश की जनता भुगत रही है‌ ।”

पूर्व डिप्टी सीएम पायलट पर बोलते हुए उन्होंने कहा, ” सचिन पायलट के लिए बीजेपी के दरवाजे बंद नहीं है ।  पर अंतिम फैसला पार्टी आलाकमान करेगी । अगर ऐसी स्थिति बनती है तो पार्टी आलाकमान इस पर फैसला लेगा  यह । ” इसी बीच विपक्ष के उपनेता राजेंद्र राठौर ने कहा, ” गेंद अब भी अध्यक्ष के पाले में है । कांग्रेस के विधायकों ने उनके सामने इस्तीफा दे दिया । विधानसभा स्वयं करें, तो विधानसभा अध्यक्ष को इसे स्वीकार करना चाहिए । जिस दिन विधान सभा के अध्यक्ष उन इस्तीफे को अपने कर्तव्य के अनुसार स्वीकार करेंगे, तब भाजपा कोई भी निर्णय लेने के लिए आगे बढ़ेगी । इससे पहले, हम यह अंतहीन देखते रहे हैं कांग्रेस का खेल । “

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here